दोगलापन सिस्टम का या व्यक्ति विशेष का❓
बड़की अदालत ......!!!!!
संविधान मे वर्णित "मौलिक अधिकारो" यानि फंडामेंटल राईट्स की रक्षा के लिए नागरिको को आर्टिकल-३२ के तहत "संवैधानिक उपचार" की व्यवस्था की गई है ।
Article-32 के तहत कोई भी नागरिक अपने फंडामेंटल राईट्स की रक्षा के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है
सुप्रीम कोर्ट आर्टिकल -३२ के तहत ही पाँच प्रकार की Writ जारी करता है ... जिन्हे क्रमश:
1- Habeas corpus 2-mandamus
3- prohibition
4- quo warranto और 5-certiorari
के रूप मे हम सभी जानते ही है
बिल्कुल यही शक्तियां राज्यो के हाई कोर्ट मे भी नीहित है , जिसकी अधिकारिता राज्यो तक सीमित है । हाई कोर्ट को ये शक्तियां संविधान के आर्टिकिल- 226 के तहत मिलती है ।
सुप्रीम कोर्ट ने जहाँगीरपुरी मे बुलडोजर रूकवाया , यहाँ तक मै कुछ भी गलत नही पाता हूँ । अब भाई , सुप्रीम कोर्ट को ये शक्तियां , और नागरिको को ये हक स्वयं संविधान ने ही दिया है ।
Mandamus यानि परमादेश की Writ के द्वारा आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर रोक दिया । यहाँ तक सब कुछ सही है ।
मगर मी -लौड .....!!!!!
क्या आप सही है ??? नही नही नही ,मुझ गरीब को आपके कोप का शिकार नही बनना है । मै "कंटेम्पट आफ मी-लौड" टाईप की गुस्ताखी कर भी नही सकता ।
मगर सवाल तो सवाल है मी-लौड ....
१- जहाँगीर पुरी मे मात्र अतिक्रमण हटाया जा रहा था, किसी के मकान नही तोडे जा रहे थे । तो मामले मे "फंडामेंटल राईट्स का उलंघ्घन तो हुआ ही नही । फिर आप परमादेश कैसे दे सकते है ????
या फिर कहिये कि "अतिक्रमण का अधिकार " भी एक "मौलिक अधिकार" है ।
२- जहाँगीर पुरी मे अतिक्रमण करने वाले, क्या भारत के नागरिक है ??? जो लोग अवैध घुसपैठिये है , ना तो वो इस देश के नागरिक है , और ना ही नागरिको को प्राप्त फंडामेंटल राईट्स और आर्टिकल -३२ के तहत Right of constitutional remedies उनको प्राप्त है ।
३- मै भी जानता हूँ, जब संविधान लागू हुआ था , तब "संपत्ति का अधिकार" भी फंडामेंटल राईट था । जिसे बाद मे मौलिक अधिकारो की सूची से हटा दिया गया था । अतिक्रमण करके खडी की गई संपत्ति को कानूनन तोड रहे अधिकारियो का आपके परमादेश का चाबुक चलना , संवैधानिक कैसे हो गया महोदय ????
४- आर्टिकिल -३२ के तहत , आपके सम्मुख याचिका लेकर आने वाले की Entity क्या है महाप्रभु ????
क्या वह जहाँगीर पुरी मे निवास करने वाला कोई व्यक्ति है , जिसके मूल अधिकार का हनन हुआ है ???
या फिर कोई संस्था , या राजनैतिक पार्टी , अथवा कोई धार्मिक संगठन ......
अरे भाई साहब मेरी बात का सीधा सा मतलब है, कि आखिर वो है कौन जिसके मौलिक अधिकार का हनन हुआ है , मने याचक कौन है ??? जिसके चलते आप को आर्टिकिल -32 के तहत यथास्थिति बनाये रखने का परमादेश देना पडा ???
जहाँ तक मेरी समझ है , मौलिक अधिकार नागरिको के होते है , पार्टियों ,धार्मिक संगठनो , अथवा संस्थाओं के नही ।
सच बताऊँ मी -लौड ???
और सच ये है कि मशहूर चोंगाधारी वकीलो का झुंड देखकर ही आपकी फट कर चौहत्तर हो जाती है ।
पिछले कुछ ही दिनो मे , ऐसे दस से ज्यादा मामले है , जब नागरिको द्वारा मौलिक अधिकार के हनन के दस से ज्यादा मामले आर्टिकिल- 32 के तहत आपके सामने लाये गये थे , तब आपकी नींद क्यों नही टूटी ????
ताजातरीन मामला तो हाथरस से अरेस्ट किये गये पत्रकार "सद्दीक कप्पन" का ही है ।
दूसरा मामला नक्सली वारवरा राव की पत्नी हेमलता द्वारा 2018 मे आर्टिकिल-३२ के तहत फाईल की गई याचिका वाला भी है ।
हे मालिक श्रेष्ठ , बामुश्किल हफ्ते भर पहले का ही तो मामला है , जब नागपुर के एक व्यक्ति द्वारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के विरूद्ध बयान देने पर , उसे तीन मामलो मे अरेस्ट किया गया है । आर्टिकल-३२ के तहत सुप्रीम कोर्ट पहुँचने पर आप ही की बैंच ने सुनवाई करने के बजाय , उन्हे आर्टिकल -226 के तहत सुप्रीम कोर्ट आने के बजाय पहले महाराष्ट्र हाई कोर्ट जाने का निर्देश क्यों दिया था ????
यदि MCD द्वारा अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर चलाने से आपकी राय मे मौलिक अधिकार का हनन हो रहा था , तो आर्टिकिल -३२ के तहत आपकी शरण मे आने वालो को आपने आर्टिकिल -२२६ के तहत दिल्ली हाई कोर्ट मे जाने को क्यों नही बोला ???
मै बताऊँ क्यों ???
क्योंकि जब तक ये दल्ले वकील , सुप्रीम कोर्ट से निकलकर हाई कोर्ट मे परमादेश जारी करवाने जाते तब तक शायद अतिक्रमण ही हट चुका होता ।
Whatsapp ki Kalam se
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