नीरज स्मृति
हम कितनी हसरतों और उम्मीदों के कातिल है !!
जिंदगी जो हमें दे रही, हम बस अब उसी के काबिल हैं !!
प्रायश्चित तो पापों का होता है !!
गुनाह तो, अब खुद के भी, ना क्षमा के काबिल है !!
जिंदगी जो हमें.........
जो दिया है हमने अपनों को वही समेट के, खुद, से खुद के दामन में ।।
प्रायश्चित है तो ये, हमें ये सोच कर करना है ।
बस हम अब इसी के काबिल है !!
हम कितनी हसरतों और उम्मीदों के कातिल हैं !!
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