जागो हिन्दू जागो

मैं चिंतित हूं...! 
क्योंकि अधिकांश हिंदुओं को लगता है कि उनकी मेहनत की कमाई, परिसंपत्ति, संवैधानिक अधिकार उनसे कोई नहीं छीन सकता क्योंकि उन्हें लगता है कि जब उनकी नज़र किसी दूसरी कौम की संपत्ति, धर्म, इज्जत पर नहीं है तो दूसरों की भी उन पर नहीं होगी। 
वज़ह, उन्होंनेे इस्लामिक इतिहास को समझा नहीं है। यह बिल्कुल कबूतर और बिल्ली के किस्से जैसा ही है और जिस नासमझी कि कीमत हमेशा कबूतर को अपनी जान से चुकानी पड़ती है। 

हिन्दुओं की इतिहास से तो छोड़ो, हाल ही के कश्मीर के घटनाक्रम से भी कोई सीख न लेने से वे देश के अनेक हिस्सों से खदेड़े जा रहे हैं। जो इतिहास से सबक नहीं सीखता वहां इतिहास खुद को बारंबार दोहराता है। ज़रा बानगी देखिए...

-एक दिन पूरे काबुल (अफगानिस्तान) का व्यापार सिक्खों का था, आज उस पर तालिबानों का कब्ज़ा है |
-सत्तर साल पहले पूरा सिंध, सिंधियों का था, आज उनकी पूरी धन-संपत्ति पर पाकिस्तानियों का कब्ज़ा है |
-एक दिन पूरा कश्मीर धन-धान्य और ऐश्वर्य से पूर्ण हिन्दुओंं का था, आज उन महलों और सेव के बागों पर आतंक का कब्ज़ा हो गया और उन्हें मिला दिल्ली में दस बाय दस का टेंट..|
-एक दिन वो था जब ढाका का हिंदू बंगाली पूरी दुनिया में जूट का सबसे बड़ा कारोबारी था | आज उसके पास सूतली बम भी नहीं बचा |
-ननकाना साहब, लवकुश का लाहौर, दाहिर का सिंध, चाणक्य का तक्षशिला, ढाकेश्वरी माता का मंदिर देखते ही देखते सब पराये हो गए |
पाँच नदियों से बने पंजाब में अब केवल दो ही नदियाँ बची |
-यह सब किसलिए हुआ.? केवल और केवल असंगठित होने के कारण, जनसांख्यकीय असंतुलन (डेमोग्राफिक इंबलैंस) के कारण। इस देश के मूल समाज की सारी समस्याओं की जड़ ही संगठन व चेतना का अभाव है |
-आज इतना आसन्न संकट देखने के बावजूद बहुतेरा समाज अभी भी कबूतर के माफिक़ ही बर्ताव कर रहा है |
कोई व्यापारी असम के चाय के बागान अपना समझ रहा है,
कोई आंध्र की खदानें अपनी मान रहा है |
तो कोई सूरत में बैठा सोच रहा है कि ये हीरों का व्यापार सदा सर्वदा उसी का रहेगा |
-कभी कश्मीर की केसर की क्यारियों के बारे में भी हिंदू यही सोचा करता था |
-तू अपने घर भरता रहा और पूर्वोत्तर का लगभग पचहत्तर प्रतिशत जनजाति समाज विधर्मी हो गया |
बहुत कमाया तूने बस्तर के जंगलों से... आज वहाँ घुस भी नहीं सकता |
आज भी आधे से ज्यादा समाज को तो ये भी समझ नहीं कि उस पर संकट क्या आने वाला है ??
बचे हुए समाज में से बहुत से अपने आप को सेकुलर मानते हैं।
कुछ समाज लाल गुलामों का मानसिक गुलाम बनकर अपने ही समाज के खिलाफ कहीं बम बंदूकें, कहीं तलवार तो कहीं कलम लेकर विधर्मियों से ज्यादा हानि पहुंचाने में जुटा है।
ऐसे में पाँच से लेकर दस प्रतिशत ही बचता है जो अपने धर्म और राष्ट्र के प्रति संवेदनशील है..!
धूर्त सेकुलरों ने उसे असहिष्णु और साम्प्रदायिक करार दे दिया..!
इसलिए आजादी के बाद एक बार फिर हिंदू समाज दोराहे पर खड़ा है..!
एक रास्ता है, शुतुरमुर्ग की तरह आसन्न संकट को अनदेखा कर रेत में गर्दन गाड़ लेना
तथा दूसरा तमाम संकटों को भांपकर सारे मतभेद भुलाकर संगठित हो संघर्ष कर अपनी धरती और संस्कृति बचाना।

निंद्रित हिन्दुओं... जागरूक हो जाओ अन्यथा कश्मीरी पंडित बनने के लिए तैयार रहो।
कश्मीरी पंडित जो आज जगह-जगह टेंटों में रह रहे हैं, वो सभी फकत तीन दशक पहले करोड़पति व्यापारी थे किन्तु सिर पर मुंह बाए खड़ी वास्तविक चुनौती को दरकिनार कर आप सभी की तरह बस बिजनेस और सेव के बागों में लीन थे... आज उनका हाल देखिए और कुछ समझिए!

तथास्तु...!

जम कर शेयर करें, कॉपी / पेस्ट करें। 
"बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी..."

Comments

Popular posts from this blog

नीरज स्मृति

सचमुच का झटका !

जोगेन्द्रनाथ मंडल- देश का गुमनाम गद्दार।